माँ.....

था गर्भ में सुप्त पड़ा जीवित होने का पूर्वाभास ना था
सृजन वेदना से पीड़ित मुख पर एक अनोखा उल्लास था
बालपन की स्मृति से स्पष्ट छलकता निरंतर मधुर रस
वह माँ की फटकार वह माँ का स्नेह भरा स्पर्श


वह सांझ सवेरे की सरल कहानियों में छुपे संस्कार के बीज
वह लाड से खिलाना सुनाकर मधुर गीत
लड़खड़ाते हुए कदमों को थामे वो हाँथ
पिताजी की डांट में भी वो रहती हमारे साथ


अत्यंत सरल जीवनयापन अत्यंत सरल मन
भगवत भक्ति के वातावरण में व्यतीत हुआ बचपन
जीवन की धूप छाँव में सदैव धैर्य रखती वो
संपूर्ण परिवार को बांधती  एक अदृश्य डोरी वो


सभी के साथ रहकर कभी लगती अकेली वो
अपनी मिलनसार प्रवृत्ति कृति से दर्शाती वो
पाककला में निपुण वह अन्नपूर्णा  है
क्रोधित हो जाए तो  लगती साक्षात  दुर्गा है

काल के प्रहार से कुछ लुप्त हो गया
दमकता हुआ सूरज मानो काली घटा में सुप्त हो गया
मैंने स्वयं को आज तक इतना असहाय नहीं पाया
जाने विधाता ने माँ की इस पीड़ा का क्या मोल लगाया

आज माँ में एक अनंत शून्य विद्यमान है
अभी भी घर के किसी कोने में  धूल फांकता श्रृंगारदान है
मैंने पिछली रात रोई आँखों से निकलती हूक देखी है
मैंने इस व्याभिचारिणी मृत्यु से हुई चूक देखी है

मानव की नश्वरता का मुझे संताप नहीं है
माँ की मुस्कान गुम होने से बड़ा पश्चाताप नहीं है
मन के किसी कटघरे में ना जाने क्यूँ दोषी बना खड़ा हूँ
कालचक्र के कुकृत्य का बोझ अपने मत्थे मढ़ रहा हूँ

 माँ की भक्ति इस कठिन समय में भी अडिग रही
भगवत्कृपा  से उसकी साधना अनवरत जारी रही
अपनी जननी की दृढ़ता को मैं श्रद्धापूर्वक प्रणाम करता हूँ
उसका कुछ अंश पा सकूं ऐसी कामना करता हूँ

वह मेरे अस्तित्व की आधारशिला है यह मुझे ज्ञात है
मुझमें जो कुछ भी अच्छा है सब उनसे ही प्राप्त है
मातृऋण के समक्ष सारे ऋण तुच्छ जान पड़ते हैं
तभी जननी जन्मभूमि को स्वर्ग से भी महान कहते हैं

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